सतत खाद्य प्रणालियां विकसित करने पर ज़ोर दिया
प्राकृतिक खेती के लिए सतत खाद्य प्रणाली मंच (SusPNF) के कार्यान्वयन की दिशा में एक कदम
बढ़ाते हुए शनिवार को डॉ. यशवंत सिंह परमार औदयानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी में एक
दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस अवसर पर हिमाचल प्रदेश के कृषि सचिव राकेश
कंवर मुख्य अतिथि जबकि पदमश्री नेक राम शर्मा वशिष्ट अतिथि रहे।
यह कार्यशाला विश्वविद्यालय, कृषि विभाग की प्राकृतिक कृषि खुशहाल योजना (पीके3वाई) और
नाबार्ड के बीच भागीदारी सहयोग का हिस्सा है जिसका उद्देश्य प्राकृतिक किसानों को सशक्त बनाना
और कृषि क्षेत्र में प्रगति को बढ़ावा देना है।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि राकेश कंवर का विचार था कि सतत खाद्य प्रणालियाँ समय की माँग हैं।
उन्होंने कहा कि राज्य में हाल ही में आई प्राकृतिक आपदा ने यह सवाल सामने खड़ा किया है कि क्या
हम उसी तरह से खेती कर पाएंगे जैसे वर्तमान में कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन ने खाद्य संकट की
अवधारणा को वास्तविकता बना दिया है। हालाँकि इस खतरे से निपटने के स्थायी समाधान स्थानीय
होंगे, लेकिन सफल होने के लिए प्रयासों का वैश्विक होना जरूरी होगा।
उन्होंने कहा कि हमारी चुनौती किसानों के लिए कम लागत वाली क्लस्टर-आधारित विकेन्द्रीकृत
प्रौद्योगिकियों को ढूंढना होगा। उन्होंने एफपीसी के सदस्यों से आग्रह किया कि वे इस परियोजना को
वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्त करने और लाभ-संचालित बाजार मॉडल की ओर बढ़ने के लिए अपनी क्षमता
निर्माण करने की दिशा में एक कदम के रूप में लें।
हिमाचल के मिलेट मैन और पद्मश्री पुरस्कार विजेता नेक राम शर्मा ने इस पहल की सराहना की और
किसानों और वैज्ञानिकों से श्री अन्न और कई स्थानीय खाद्य पदार्थों, जिन्हें वर्षों से भुला दिया गया
है, की खेती करने और भोजन का हिस्सा बनाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि हमारी भोजन की
आदतों ने हम जो उगाते हैं उसे बदल दिया है। जल, जंगल और जमीन पर फिर से ध्यान केंद्रित करने
पर उन्होंने जोर दिया।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजेश्वर सिंह चंदेल ने कहा कि यह देश में पहला उदाहरण है जहां
- विश्वविद्यालय को प्राकृतिक कृषक उत्पादक कंपनियों (एन-एफपीसी) की सहायता के लिए उत्पादक संगठन प्रमोटिंग इंस्टीट्यूशन (पी॰ओ॰पी॰आई॰) घोषित किया गया है। उन्होंने कहा कि यह परियोजना देश में प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों की सफलता की कहानियों को शामिल करके रोडमैप स्थापित करने में मदद करेगी। प्रोफेसर चंदेल ने कहा कि विश्वविद्यालय अन्य भागीदार संगठनों के सहयोग से न केवल सहायता प्रदान करेगा बल्कि बाजार संपर्क विकसित करेगा और नाबार्ड जैसे वित्तीय संस्थानों तक एफपीसी की पहुंच बढ़ाएगा।
इससे पहले, कृषि निदेशक डॉ. रघबीर सिंह ने कहा कि दुनिया अब प्राकृतिक खेती के लिए हिमाचल
मॉडल को देख रही है। उन्होंने कहा कि राज्य में किसानों के बीच छोटी लैंड होल्डिंग्स एक चुनौती है
और इस समस्या को दूर करने के लिए एफपीसी एक व्यवहार्य समाधान है जो किसानों की बाज़ार में
अपने उत्पाद को ले जाने की क्षमता को बढ़ाता है। उन्होंने कम लागत वाली लघु भंडारण सुविधाएं
विकसित करने का भी आह्वान किया, जिससे पहाड़ी किसानों को फायदा हो सके। विस्तार शिक्षा
निदेशक डॉ. इंद्र देव ने कहा कि यह पहल किसानों की आय में वृद्धि को लक्षित कर रही है और आने
वाले समय में विश्वविद्यालय एक स्थायी खाद्य प्रणाली का एक संपूर्ण मॉडल देने में सक्षम होगा। उन्होंने
कहा कि विश्वविद्यालय के छात्र भी इस कार्यशाला में भाग ले रहे हैं और भविष्य में इन में कई को
मास्टर प्रशिक्षक बनाया जाएगा।
कार्यशाला के दौरान कई तकनीकी सत्रों में प्राकृतिक खेती के लिए प्रमाणन की CETARE प्रणाली
जैसे विषयों पर चर्चा की गई। सभी हितधारकों के बीच प्राकृतिक किसानों के लिए एक मजबूत
समर्थन पारिस्थितिकी तंत्र स्थापित करने पर चर्चा हुई, जिसमें फसल कटाई के बाद सहायता, सतत
विकास लक्ष्यों के अनुरूप मानचित्रण और विभिन्न तकनीकी सहायता प्रदान करने जैसे महत्वपूर्ण
संसाधन शामिल थे। कार्यशाला के दौरान प्राकृतिक खेती आधारित एफपीसी द्वारा विकसित विभिन्न
नवीन उत्पादों की एक प्रदर्शनी भी लगाई गई।
नाबार्ड के एजीएम अशोक चौहान, विश्वविद्यालय के सभी वैधानिक अधिकारी और विभाग
अध्यक्ष, प्राकृतिक कृषि खुशहाल किसान योजना की राज्य परियोजना कार्यान्वयन इकाई सहित इस
परियोजना से जुड़े सभी हितधारक, प्राकृतिक खेती आधारित एफपीसी के सीईओ और निदेशक
मंडल और इससे जुड़े विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने कार्यशाला में भाग लिया। कार्यशाला में
विश्वविद्यालय के छात्रों और विश्वविद्यालय में प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय प्रशिक्षण में भाग ले रहे कई
संस्थानों के वैज्ञानिकों ने भी इस कार्यक्रम में भाग लिया।